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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
दारय़ेद्यन्महीं कृत्स्नां शोषय़ेद्वा महोदधिम् |  १३२   क
संहरेद्वा जगत्कृत्स्नं विसृष्टं शूलपाणिना ||  १३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति