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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
पुरस्ताच्चैव देवस्य नन्दिं पश्याम्यवस्थितम् |  १४४   क
शूलं विष्टभ्य तिष्ठन्तं द्वितीय़मिव शङ्करम् ||  १४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति