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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
स्वाय़म्भुवाद्या मनवो भृग्वाद्या ऋषय़स्तथा |  १४५   क
शक्राद्या देवताश्चैव सर्व एव समभ्ययुः ||  १४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति