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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
व्रह्मा भवं तदा स्तुन्वन्रथन्तरमुदीरय़न् |  १४७   क
ज्येष्ठसाम्ना च देवेशं जगौ नाराय़णस्तदा |  १४७   ख
गृणञ्शक्रः परं व्रह्म शतरुद्रीय़मुत्तमम् ||  १४७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति