अनुशासन पर्व  अध्याय १४

उपमन्युरु उवाच

शक्रोऽसि मरुतां देव पितॄणां धर्मराडसि |  १६०   क
व्रह्मलोकश्च लोकानां गतीनां मोक्ष उच्यसे ||  १६०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति