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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
भगवन्देवदेवेश लोकनाथ जगत्पते |  १७३   क
लभतां सर्वकामेभ्यः फलं त्वत्तो द्विजोत्तमः ||  १७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति