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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
अव्रुवं च तदा देवं हर्षगद्गदय़ा गिरा |  १७८   क
जानुभ्यामवनिं गत्वा प्रणम्य च पुनः पुनः ||  १७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति