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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
यं न पश्यन्ति चाराध्य देवा ह्यमितविक्रमम् |  १८०   क
तमहं दृष्टवान्देवं कोऽन्यो धन्यतरो मय़ा ||  १८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति