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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
अजरश्चामरश्चैव भव दुःखविवर्जितः |  १९१   क
शीलवान्गुणसम्पन्नः सर्वज्ञः प्रिय़दर्शनः ||  १९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति