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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
अक्षय़ं यौवनं तेऽस्तु तेजश्चैवानलोपमम् |  १९२   क
क्षीरोदः सागरश्चैव यत्र यत्रेच्छसे मुने ||  १९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति