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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
चित्रं शीघ्रतरत्वाच्च चरन्तमसिधारिणम् |  ५४   क
तमेकमसुराः सर्वे सहस्रमिति मेनिरे ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति