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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
एवं कृतस्वस्त्ययनस्तय़ाहं; तामभ्यनुज्ञाय़ कपीन्द्रपुत्रीम् |  २४   क
पितुः समीपे नरसत्तमस्य; मातुश्च राज्ञश्च तथाहुकस्य ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति