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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
प्राप्यानुज्ञां गुरुजनादहं तार्क्ष्यमचिन्तय़म् |  २६   क
सोऽवहद्धिमवन्तं मां प्राप्य चैनं व्यसर्जय़म् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति