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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
तत्राहमद्भुतान्भावानपश्यं गिरिसत्तमे |  २७   क
क्षेत्रं च तपसां श्रेष्ठं पश्याम्याश्रममुत्तमम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति