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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
दिव्यं वैय़ाघ्रपद्यस्य उपमन्योर्महात्मनः |  २८   क
पूजितं देवगन्धर्वैर्व्राह्म्या लक्ष्म्या समन्वितम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति