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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
वाय़्वाहारैरम्वुपैर्जप्यनित्यैः; सम्प्रक्षालैर्यतिभिर्ध्याननित्यैः |  ३८   क
धूमाशनैरूष्मपैः क्षीरपैश्च; विभूषितं व्राह्मणेन्द्रैः समन्तात् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति