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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
क्रीडन्ति सर्पैर्नकुला मृगैर्व्याघ्राश्च मित्रवत् |  ४२   क
प्रभावाद्दीप्ततपसः संनिकर्षगुणान्विताः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति