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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
नानानिय़मविख्यातैरृषिभिश्च महात्मभिः |  ४४   क
प्रविशन्नेव चापश्यं जटाचीरधरं प्रभुम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति