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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा मृगपक्षिष्वथाग्निषु |  ४७   क
धर्मे च शिष्यवर्गे च समपृच्छमनामय़म् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति