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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
तथा शतमुखो नाम धात्रा सृष्टो महासुरः |  ५८   क
येन वर्षशतं साग्रमात्ममांसैर्हुतोऽनलः |  ५८   ख
तं प्राह भगवांस्तुष्टः किं करोमीति शङ्करः ||  ५८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति