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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
तं वै शतमुखः प्राह योगो भवतु मेऽद्भुतः |  ५९   क
वलं च दैवतश्रेष्ठ शाश्वतं सम्प्रय़च्छ मे ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति