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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
निराहारा भय़ादत्रेस्त्रीणि वर्षशतान्यपि |  ६६   क
अशेत मुसलेष्वेव प्रसादार्थं भवस्य सा ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति