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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
शरणं प्राप्य कौन्तेय़ वरदं भुवनेश्वरम् |  २९   क
उमापतिं विरूपाक्षं दक्षय़ज्ञनिवर्हणम् |  २९   ख
प्रजानां पतिमव्यग्रं भूतानां पतिमव्ययम् ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति