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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
कुतः क्षीरोदनं वत्स मुनीनां भावितात्मनाम् |  ८२   क
वने निवसतां नित्यं कन्दमूलफलाशिनाम् ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति