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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
अप्रसाद्य विरूपाक्षं वरदं स्थाणुमव्ययम् |  ८३   क
कुतः क्षीरोदनं वत्स सुखानि वसनानि च ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति