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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् |  ८४   क
तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ||  ८४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति