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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
ततो मामाह देवेन्द्रः प्रीतस्तेऽहं द्विजोत्तम |  ९२   क
वरं वृणीष्व मत्तस्त्वं यत्ते मनसि वर्तते ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति