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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि |  ९४   क
वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति