अनुशासन पर्व  अध्याय १४

वासुदेव उवाच

पशुपतिवचनाद्भवामि सद्यः; कृमिरथ वा तरुरप्यनेकशाखः |  ९५   क
अपशुपतिवरप्रसादजा मे; त्रिभुवनराज्यविभूतिरप्यनिष्टा ||  ९५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति