अनुशासन पर्व  अध्याय १४

वासुदेव उवाच

दिवसकरशशाङ्कवह्निदीप्तं; त्रिभुवनसारमपारमाद्यमेकम् |  ९८   क
अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं; जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम् ||  ९८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति