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वन पर्व
अध्याय २२९
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वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा च तदहो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |  १४   क
ईजे राजर्षिय़ज्ञेन सद्यस्केन विशां पते |  १४   ख
दिव्येन विधिना राजा वन्येन कुरुसत्तमः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति