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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
स समाश्वास्य पितरं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् |  १७   क
अन्वशाद्वै स धर्मात्मा पृथिवीं भ्रातृभिः सह ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति