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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽनुनीतो भगवता विष्टरश्रवसा स्वय़म् |  २   क
द्वैपाय़नेन कृष्णेन देवस्थानेन चाभिभूः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति