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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ामास देवांश्च व्राह्मणांश्च युधिष्ठिरः |  ५   क
कृत्वाथ प्रेतकार्याणि वन्धूनां स पुनर्नृपः |  ५   ख
अन्वशासत धर्मात्मा पृथिवीं सागराम्वराम् ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति