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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
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धृतराष्ट्र उवाच
यथा च पाण्डुर्भ्राता मे दय़ितो भवतामभूत् |  २   क
स चापि पालय़ामास यथावत्तच्च वेत्थ ह ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति