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वन पर्व
अध्याय १११
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
ऋद्धो भवाञ्ज्योतिरिव प्रकाशते; मन्ये चाहं त्वामभिवादनीय़म् |  ९   क
पाद्यं वै ते सम्प्रदास्यामि कामा; द्यथाधर्मं फलमूलानि चैव ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति