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सभा पर्व
अध्याय १४
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कृष्ण उवाच
रत्नभाजो हि राजानो जरासन्धमुपासते |  १४   क
न च तुष्यति तेनापि वाल्यादनय़मास्थितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति