सभा पर्व  अध्याय १४

कृष्ण उवाच

प्रोक्षितानां प्रमृष्टानां राज्ञां पशुपतेर्गृहे |  १७   क
पशूनामिव का प्रीतिर्जीविते भरतर्षभ ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति