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सभा पर्व
अध्याय १४
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युधिष्ठिर उवाच
शममेव परं मन्ये न तु मोक्षाद्भवेच्छमः |  ५   क
आरम्भे पारमेष्ठ्यं तु न प्राप्यमिति मे मतिः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति