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वन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
न चेत्स मम राजेन्द्र गृह्णीय़ान्मधुरं वचः |  १२   क
पथ्यं च भरतश्रेष्ठ निगृह्णीय़ां वलेन तम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति