वन पर्व  अध्याय १४

वासुदेव उवाच

सोऽहमेत्य कुरुश्रेष्ठ द्वारकां पाण्डुनन्दन |  १५   क
अश्रौषं त्वां व्यसनिनं युय़ुधानाद्यथातथम् ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति