वन पर्व  अध्याय १४

वासुदेव उवाच

श्रुत्वैव चाहं राजेन्द्र परमोद्विग्नमानसः |  १६   क
तूर्णमभ्यागतोऽस्मि त्वां द्रष्टुकामो विशां पते ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति