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सभा पर्व
अध्याय ४९
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दुर्योधन उवाच
एवं दृष्ट्वा नाभिविन्दामि शर्म; परीक्षमाणोऽपि कुरुप्रवीर |  २५   क
तेनाहमेवं कृशतां गतश्च; विवर्णतां चैव सशोकतां च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति