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विराट पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्यस्याः प्रददौ कांस्यं सपिधानं हिरण्मय़म् |  १७   क
सा शङ्कमाना रुदती दैवं शरणमीय़ुषी |  १७   ख
प्रातिष्ठत सुराहारी कीचकस्य निवेशनम् ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति