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विराट पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा कैकेय़ि सैरन्ध्र्या समेय़ां तद्विधीय़ताम् |  २   क
तां सुदेष्णे परीप्सस्व माहं प्राणान्प्रहासिषम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति