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विराट पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
आजौरभ्रं च सुभृशं वहूंश्चोच्चावचान्मृगान् |  ८   क
कारय़ामास कुशलैरन्नपानं सुशोभनम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति