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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
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व्यास उवाच
तावपि स्पर्धिनौ राजन्पृथगास्तां परस्परम् |  ५   क
वृहस्पतिश्च संवर्तं वाधते स्म पुनः पुनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति