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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
अपराद्धमिवात्मानं मन्यमाना महारथाः |  ३४   क
तस्थुः प्राञ्जलय़ः सर्वे परिवार्य धनेश्वरम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति