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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
शरणं त्वां महाराज प्रपन्नौ स्व उभावपि |  १११   क
क्षन्तुमर्हसि मे राजन्प्रणतस्याभिय़ाचतः ||  १११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति