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द्रोण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
ते चैवोभे गदे श्रेष्ठे समासाद्य परस्परम् |  २१   क
श्वसन्त्यौ नागकन्येव ससृजाते विभावसुम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति