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द्रोण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
ततो गदाग्राभिहतौ क्षणेन रुधिरोक्षितौ |  २३   क
ददृशाते महात्मानौ पुष्पिताविव किंशुकौ ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति